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Kawardha

Kawardha CG E district

Kawardha
Kawardha

जिला कबीरधाम सकरी नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक शांतिपूर्ण और आकर्षक स्थान है। कबीर साहिब के आगमन और उनके शिष्य धर्मदास के वंशज की गद्दी स्थापना के कारण इसका नाम कबीरधाम था। जो कबीरधाम के रूप में जाना जाता है।

जिला मुख्यालय से लगभग 17 किमी भोरमदेव ऐतिहासिक और पुरातात्विक रूप से एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह जगह 9वीं सदी से 14 वीं शताब्दी तक नागवंशी राजाओं की राजधानी थी। उसके बाद यह क्षेत्र राज्य के रतनपुर से संबंधित थे, जो हैहायवंशी राजा के कब्जे में आया। मंदिरों के पुरातात्विक अवशेष और इन राजाओं द्वारा बनाए गए पुराने किले अभी भी उपलब्ध हैं।

History Kawardha Chhattisgarh

जिला कबीरधाम एक शांतिपूर्ण और आकर्षक जगह है जो सकरी नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। कबीर साहिब के आगमन और उनके शिष्य धर्मदास के वंशजों की सीट की स्थापना के कारण, इसे कबीरधाम नाम दिया गया था। कबीरधाम के रूप में जिला मुख्यालय से लगभग 17 किमी दूर भोरमदेव ऐतिहासिक और पुरातात्विक रूप से एक बहुत ही महत्वपूर्ण जगह है। यह स्थान 9वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी तक नागवंशी राजाओं की राजधानी थी। इसके बाद इस क्षेत्र में राज्य रतनपुर से संबंधित हैवाईवंशी राजाओं के कब्जे में आए। इन राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर और पुराने किले के पुरातात्विक अवशेष अभी भी उपलब्ध हैं।

कवर्धा/कबीरधाम जिले की स्थापना 6 जुलाई 1998 को राजनांदगांव जिले के कुछ हिस्से को अलग कर किया गया था। कबीरधाम संकरी नदी के दक्षिणी किनारे पर बसा हुआ है। कबीर साहिब के आगमन और उनके शिष्य धर्मदास के वंशज की गददी स्थापना के कारण इसका नाम कबीरधाम था। जो कबीरधाम के रूप में जाना जाता है।

जिला मुख्यालय से लगभग 17 किमी की दूरी पर ऐतिहासिक स्थल भोरमदेव स्थित है। यह जगह 9वीं सदी से 14 वीं शताब्दी तक नागवंशी राजाओं की राजधानी थी। उसके बाद यह क्षेत्र राज्य के रतनपुर से संबंधित थे, जो हैहयवंशी राजा के कब्जे में आया। मंदिरों के पुरातात्विक अवशेष और इन राजाओं द्वारा बनाए गए पुराने किले अभी भी उपलब्ध हैं।

Kawardha Description

स्थापना - 6 जुलाई 1998
क्षेत्रफल - 4447.05 वर्ग किलोमीटर
तहसील - कवर्धा, बोड़ला, पंडरिया, सहसपुर लोहार।
विकासखण्ड - कवर्धा, बोड़ला, पंडरिया, सहसपुर लोहार।
जनसंख्या - 822526
नगर पंचायत - 5
नगर पालिका - 1
ग्राम पंचायत - 371

प्रमुख नदियाँ : संकरी, बंजर, फेक।
छत्तीसगढ़ की सबसे ऊंची चोटी "बदरगढ़" कवर्धा जिले में ही स्थित है, इसकी उँचाई करीब 1176 मीटर है।
प्रमुख जनजातियाँ : बैगा, गोंड़

Major Attractions Kawardha District

Bhoramdev Tample भोरमदेव मंदिर

Bhoramdev

भोरमदेव मंदिर जिला मुख्यालय कवर्धा से उत्तर पश्चिम में 18 किलोमीटर की दूरी पर सतपुड़ा मैकल पहाड़ियों के तल में बसे हुए चौरा गांव में स्थित है। भोरमदेव मंदिर का निर्माण फणी नागवंश के छठवें राजा गोपाल देव द्वारा 11 वीं शताब्दी 1087 ई में कराया गया था। मंदिर में बनाए गए तीन प्रवेश द्वार जो तीनों की आकृति अर्द्ध मंडप जैसी ही दिखाई देती है।

इस मंदिर मंडप में 16 स्तंभ तथा चारों कोनों पर चार अलंकृत भित्ति स्तंभ है। मंदिर के वर्गाकार गर्भगृह में हाटकेश्वर महादेव विशाल जलाधारी के मध्य प्रतिष्ठित है। गर्भगृह में ही पद्मासना राजपुरूष सपत्नीक,पदमासना सत्पनीक ध्यान मग्य योगी,नृत्य गणपति की अष्ठभूजी प्रतिमा तथा फणीनागवंशी राजवंश के प्रतीक पांच फणों वाले नाग प्रतिमा रखी हुई है।

काले भूरे बलुआ पत्थरों से निर्मित मंदिरी की वाहय दीवानों पर देवी देवताओं की चित्ताकर्षक एवं द्विभुजी सूर्यप्रतिमा प्रमुख है। मंदिर के वाह्य सौदर्य दर्शन का सबसे उपयुक्त स्थल ईशान कोण अर्थात भोरवदेव के ठीक सामने है,यहां से मंदिरन रथाकार दिखाई देखता है।

यह मंदिर तल विन्यास से सप्तरथ चतुरंग,अंतराल,अंलकृत, स्तंभों से युक्त वर्गाकार मण्डप है। उध्र्व विन्यास में उधिष्ठान जंघा एवं शिखर मंदिर के प्रमुख अंग हे। मंदिर के जंघा की तीन पंकित्यों में विभिन्न देवी देवताओं की कृष्णलीला, नायक-नायिकाओं, अष्ठद्विकपालों, युद्ध एवं मैथुन दृष्यों में अलंककरण किया गया है।

मड़वा महल Madwa Mahal

भोरमदेव मंदिर से आधे किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण में चैरा ग्राम के समीप एक प्रस्तर निर्मित पश्चिमांभिमुख एक शिव मंदिर है, जिसे मड़वा महल कहा जाता है। स्थानीय लोग इस दूल्हादेव मंदिर के नाम से जानते है। इस मंदिर का निर्माण फणिनागवंश के चैबीसवें राजा रामचन्द्र देवराज द्वारा 1349 ई में रतनपुर राज्य की कलचुरी राजकुमारी अंबिका देवी के संग विवाहोपरांत करवाया गया था। मड़वा महल के शिलालेख से मिलती हे। इस शिलालेख में फणिनावंश की उत्पत्ति तथा वंशावली दी गई है।

Kawardha Mahal कवर्धा महल

इतालवी मार्बल से बना कवर्धा महल बहुत सुन्दर है। इसका निर्माण महाराजा धर्मराज सिंह ने 1936-39 ई. में कराया था। यह महल 11 एकड़ में फैला हुआ है। महल के दरबार के गुम्बद पर सोने और चांदी से नक्काशी की गई है। गुम्बद के अलावा इसकी सीढ़ियां और बरामदे भी बहुत खूबसूरत हैं, जो पर्यटकों को बहुत पसंद आते हैं। इसके प्रवेश द्वार का नाम हाथी दरवाजा है, जो बहुत सुन्दर है।

छेरकी महल Chherki Mahal Kawardha Kabirdham

छेरकी महल भोरमदेव मंदिर के दक्षिण-पश्चिम में एक किलोमीटर की दूरी पर यह छेरकी महल स्थापित है। इस ऐतिहातिक एवं पुरात्व महत्व के छेरकीमहल में शिव भगवान विराजित है। ईंट प्रस्त्र निर्मित इस मंदिर का मुख पूर्व दिशा की ओर है। 14 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में निर्मित इस मंदिर में छेरी बकरी का गंध आज भी आती है, इसलिए इस मंदिर नुमा महल को छेरकी महल के नाम से जाना जाता है। द्वार चैखट की वाम पाश्र्व द्वारा शाखा में नीचे चर्तुभूजी शिव एवं द्विभुजी पार्वती खड़े है। मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है। मध्य में कृष्ण प्रस्तर निर्मित शिवलिंग जलाधारी पर स्थापित है।

राधाकृष्ण मन्दिर Radha Krishna Tample Kawardha Chhattisgarh

इस मन्दिर का निर्माण राजा उजीयार सिंह ने 180 वर्ष पहले कराया था। प्राचीन समय में साधु-संत मन्दिर के भूमिगत कमरों में कठिन तपस्या किया करते थे। इन भूमिगत कमरों को पर्यटक आज भी देख सकते हैं। मन्दिर के पास एक तालाब भी बना हुआ है। इसका नाम उजीयार सागर है। तालाब के किनारे से मन्दिर के खूबसूरत दृश्य दिखाई देते हैं, जो पर्यटकों को बहुत पसंद आते हैं।

राधाकृष्ण मन्दिर के अलावा पर्यटक यहां पर भोरमदेव माण्डवा महल और मदन मंजरी महल मन्दिर भी देख सते हैं। यह तीनों मन्दिर एक-दूसरे के काफी नजदीक हैं। भोरमदेव माण्डवा महल और मदन मंजरी महल मन्दिर पुष्पा सरोवर के पास स्थित हैं। इन दोनों मन्दिरों के निर्माण में मुख्य रूप से मार्बल का प्रयोग किया गया है। सरोवर के किनार पर्यटक चहचहाते पक्षियों को भी देख सकते हैं।

Tourist places Kawardha पर्यटन स्थल

भोरमदेव अभ्यारण्य, मड़वा महल, रानीदाह, छेरकी महल, पचराही, चिल्फी घाटी एवं सरीदा दादर।

सरोदा जलाशय Saroda Reservoir Kawardha

यह जलाशय कवर्धा से 8 किलोमीटर दूर स्थित है। यह पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। यह स्थान सनसेट पाइंट के रूप में विकसित हो चुका है। इसका निर्माण वर्ष 1963 में किया गया था। इस जलाशय का निर्माण "उतानी नाला" को बांधकर किया गया है।

छीरपानी जलाशय Chhirpani Jalashay
बोड़ला से 7 किमी दूरी पर छीरपानी जलाशय स्थित है। इस जलाशय का निर्माण मध्यम परियोजना के तहत किया गया है।

सुतियापाट जलाशय Sutiyapaat Jalashay
सहसपुर लोहारा अंतर्गत ग्राम भैंसबोड़ में सुतियापाट जलाशय स्थित है। लोहारा से इसकी दूरी 18 किमी है। यह लोगों के लिए पर्यटन का अच्छा केंद्र माना जा सकता है।

बकेला जैन तिर्थ Bakela Jain Tirth

बकेला, पिंडारी तहसील मुख्यालय के 20 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम और पचराही से एक किलोमीटर कि दुरी पर स्थित है, जहां से 10 वीं शताब्दी में काले रंग की ग्रेनाइट पत्थर से बना जैन तीर्थंकर प्रभु पार्श्वनाथ की 51 इंच लंबी मूर्ति स्थापित है, जोकि 1978 में प्राप्त की गई थी। यहां जैन धर्मावलम्बियों हेतु जैन तीर्थयात्रा विकसित किया गया है।

सतखण्डा महल Satkhanda Mahal

भोरदेव कि और से पश्चिम कि तरफ निकलने वाली सड़क पर जाने पर “हरमो” नामक एक गांव स्थित है, जिसमें एक इमारत है जिसे सतखण्डा महल के नाम से जाना जाता है। इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि छोटे सीढ़ी के साथ यह इमारत में सात खण्ड हैं। इमारत के वास्तुकला के आधार पर इसे एक किला भी कहा जा सकता है। पूर्व से पश्चिम की ओर इसकी लंबाई 21 मीटर है और उत्तर से दक्षिण चौड़ाई 10 मीटर है और ऊंचाई 45 फीट है। इस भवन को भगवान वल्लभाचार्य के जन्मस्थान के रूप में वर्णित किया जाता है।

पीड़ा घाट Pidha Ghat

यह स्थान प्रकृति प्रेमियों के लिए अप्रत्याशित क्षेत्रों में से एक है । इसे जिले के पर्यटकों स्थलों में हाल ही में शामिल किया गया है जिसे बेहतर सुविधाओं और सुगम पहुँच मार्गों के साथ विकसित किया जा रहा है। यहाँ न केवल सर्व सुविधायुक्त आवासों का निर्माण किया जा रहा है,
बल्कि पीड़ा-घाट के केन्द्रीय स्थल को चिन्हित कर पारदर्शी कांच युक्त एक ऊँची मीनार (वॉच टावर) का निर्माण किया गया है। चिल्फी घाटी के जंगल के बीचों-बीच स्थित होने के कारण यह जगह अत्यंत शांत है।

आवागमन Traffic for Kawardha

वायु मार्ग - कवर्धा रायपुर से 120 कि॰मी॰ की दूरी पर स्थित है। रायपुर में पर्यटकों के लिए हवाई अड्डे का निर्माण किया गया है और यहां से पर्यटक आसानी से कवर्धा तक पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग - रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनंदगांव, डोंगरगढ़ और जबलपुर रेलवे स्टेशन से आसानी से कवर्धा तक पहुंचा जा सकता है। रायपुर से कवर्धा आने के लिए पर्यटकों को ज्यादा आसानी रहती है क्योंकि वहां से कवर्धा तक काफी अच्छी बस सेवा है।
सड़क मार्ग - पर्यटक रायपुर-जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 से आसानी से कवर्धा तक पहुंच सकते हैं। इनके अलावा रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनंदगांव, डोंगारगाह और जबलपुर से पर्यटक बसों और टैक्सियों द्वारा आसानी से कवर्धा तक पहुंच सकते हैं।

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